Sunday, December 9, 2018

Aaj fir wo roti hui Ghar ayi
Maa ne poochha 
Kuchh Na boli bas ghur ke ek Nazar dekha aur chali gayi apne kamre me
Maa ne Socha aaj fir tution me sir ne daant lagayi hogi aur ye soch ke lag gayi rasoi me, 
Rasoi nibti hi thi ke jethaniji aa gayi meenmekh nikalne isme Namak Kam usme mirch jyada , maa bas sar jhukaye kone khadi thi, jethani ji ki family kha chuki to maa ne bacha khucha ek thali me dala aur thali leke beti ke kamre me gayi.
Beti ne fir use ghur Kar dekha , maa boli Ari Didi ki bat ka bura nahin lagate, thode taane sunne padte par bete ek chhat to hai Ham do anatho ke sar, fir wo tujhe padhane ka kharcha bhi karti, dil ki buri nahin wo.
Chal ab kuchh kha pi le, fir itminan se batana tution me Kya hua?
Beti ne fir maa ko dekha aur bola maa itminan ??
Aur bolte bolte apne ang par dhamki chuni khench Li
Maa ki dekhte hi cheekh nikal gayi
Maa ne beti ko apne seene se laga liya aur dubak ke dono kafi der tak siskti Rahi
..
Logo ka hujum Ghar ke bahar khada tha , police ki galiya sadsadat ati ja Rahi thi, jethhani dahade maar Kar chila Rahi thi Haye kalmunhi kha gayi mere pati ko,  aur maa ek taraf mook khadi thi kamre me Jahan ek  lash  padi thi
  jeth 
Aur dabi awaz me padosi bol rahe the 
Dekho to kaisi nirdayi hai jis Ghar ne Sahara diya usike Malik ko kha gayi dayan
Aur maa man hi man pighal Rahi thi 
Pahle mere sath , ab khud ki beti ke sath
Aise Insan ko jeene ka koi haq nahin......


Monday, April 1, 2013

गुमान और गर्व

सजी संवरी एक्सप्रेस वे
देख खुद को इतराए
कभी देखे अपने divider को
तो कभी बीच में लगे फूलो
के पौधों पे इठलाये
और आस पास लहराते खेतो
को देख देख मुस्काए
अपनी काली सड़क पर
सफ़ेद लकीर से नजर कटवाए
और जब भी आस पास कोई
 नन्ही सी पगडण्डी देख
अभिमान से उस पे गुर्राए
देख तू कितनी टेढ़ी मेढ़ी
और मैं सीधी  सपाट दौड़ती जाऊ
तू सुस्त में सरपट तेज़ी लाकर
मुसाफिरों  झटपट मंजिल तक पहुंचाऊ
पगडण्डी धीरे से मुड के बोली
बहना तुम्हे देख तू ही नहीं मुझे
भी तुझ पे गर्व होता है
पर ये देख के दिल मेरा  तेरे लिए रोता है
मैं आज भी कुचली जाती इन्सान या जानवर के पैरों  से
और तू सरपट दौड़ती पहियों से .....................



Saturday, December 29, 2012

29-12-12..........black saturday

andheri galiyo se na nikalna benakab

har libas me yahan insan baitha hai

.
.
.
.
.
.
.
dekho ye ham nahi shaitan shaitan ko kahta hai...........



2.
dekho dur hi rahna....


kareeb na ana


dil ke har zakhm par

samjhauto ki keele gadi hain

kahin koi keel ukhad kar

tumhara badan na cheer le...........


3.
dekho
suno
socho
in sab se upar hai
poochho khud se
kya insan bankar mujhe sanso ka karz
yun zilat lekar chukana hoga..........

:(

Sunday, December 16, 2012

तेरी यादो के टूट कर बरसे इतने पत्थर के ज़माना मेरी मोहब्बत को शैतान समझ बैठा है

Tuesday, April 17, 2012

आखरी ख़त

सुजा के बाबूजी शत प्रणाम......
यह घिनोना अपराध करने का ख्याल पहली बार तब मन में आया था
जब तुमने यह कह कर दिलासा मुझे दिलाया था......
सुजा की माँ आज एक रात और फुटपाथ पर सोता हूँ
शायद कोई धन्ना सेठ आ जाये और कम्बल दान कर जाये
बेच वो कम्बल बच्चो के दे जून खाने का इन्तेजाम बस हो जाये
कम्बल तो नहीं लाये तुम अपिव्तु कफ़न में लिपटे तुम जरुर आये....
लोगो के बर्तन धोकर किसी तरह बच्चो को अब तक पाला है
पर टी.बी ने अब मुझे पूरी तरह निचोड़ डाला है
तुम्हारा बेटे की भूख अब दो रोटी में नहीं भरती
और बेटी की जवानी अब फटे कपड़ो से है झांकती
और तुम ही कहा करते थे....
गरीब की बेटी पर सांझी नज़र होती है
वो अहसास भी हुआ ...जब चौराहे पर
कुछ मवालियो ने हमारी बेटी को छेड़ा था
बस गिनी चुनी साँसों से अब में जीने
और बच्चो को और जिलाने का कारोबार नहीं कर सकती
बेटी को मव्वालियो से बचने के लिए एक गोली खिला दी
और बेटे को इसलिए के अनाथ कहीं खुद मव्वाली न बन जाये...
अब ये आखिरी गोली मेरे नाम की....
हो सके तो हम सबको लेने स्वर्ग के द्वार आ जाना...
यहाँ साथ जी न सके...वहां साथ जरुर निभाना......

Monday, March 26, 2012

सावन आये तो तू भी आ जाना

सावन आये तो तू भी आ जाना
मन के आँगन की फुलवाड़ी से
दो फूल तोड़ लाना
सजा देना उसे मेरे बालो में
और दो मीठी बाते बोल लेना

धीरे से फिर दिल की दराज़ खोलना
उनमे कुछ ख्वाब बुने रखते थे हम कभी
उन मखमली ख्वाबो को तू
ज़रा अपनी आँखों से भी छू लेना.....

फिर हलके से रूह में उतर कर
तू मुझे इस दुनिया से दूर कहीं
उस जगह ले चलना
जहाँ से लौट के कोई सदा नहीं आती कभी

हर फागन में यही गुहार तुझसे लगते हैं
प्रेम का पुराना आलाप सुनाते हैं
ये आखिरी बार गुहार करते हैं
हर बार की तरह
नैनों को मेघो समझ न बरसाना .
सावन आये तो तू भी आ ही जाना...

Tuesday, December 27, 2011

meri chhoti kavitaye

1.
कुछ ख्वाब देख कर

हैरान थी ऑंखें उनकी

शायद सपने में
कोई आके उन्हें
आइना दिखा गया..


2.
कुछ गीले सपने

टूटे से बिखरे थे

उसके आंगन में

शायद सूखी आँखों में

कुछ आंसू और बचे थे. ...............

3.
ऐ दिल कहा था

न रोना इतना

ये जमीन गीली न करना

देख..

कितने सपने फिसल के गिरे है यहाँ.

4.
वो देखो दूर खडी मौत
मुझे देख कहकहे लगा रही
और अपनी ठिठोली भरे
अंदाज़ में पूछ रही

इन्सान बनके जन्मे हो....
इन्सान बन कर मर भी पाओगे......?????????????

5.
चुप रह कर भी कह जाती हैं

बातें कई हमारी ऑंखें

इसलिए हम

आजकल पलके मूंदे रहते हैं..

6.
बहुत तंग हैं दिल की वो गलियां

जिनसे होकर मेरी साँसे गुज़रती हैं

तुम अपने यादो की तस्वीर

कहीं और जाकर लगा दो

Friday, October 7, 2011

पहचान

दिल के अरमानो को सीने से बाहर निकालो

शहर कि गलिया तंग हैं...

इन्हें खुली हवा थोड़ी खिला दो


लाख जफ्फा करे दुनिया तो क्या

रंझो ग़म को तुम अपना गुलाम बना दो

मुस्कराने कि सजा हर पल मिलेगी

मगर फिर भी तुम उसे अपना ईमान बना दो

बदल दो मायने खुदाई के अपने वास्ते

बस खुद से एक बार अपनी पहचान बना दो

Thursday, March 24, 2011

बूढ़े बरगद

सदियों की उम्र लिए
बरगद के कुछ पेड़
वहीँ खड़े हैं
जहाँ
दुरी मिटाने मेरे शहर में
एक पुल बन रहा

धीरे धीरे एक आड़ी
चल रही उनके सीनों पर
और एक एक कर
वो तरक्की की बलि चढ़ रहे

शायद....
खुद को काट कर
नयी पीढी के लिए
रास्ता बनाना
हर पुराने
बरगद के नसीब है...

पुल तो बना था दुरी मिटाने
पर ये बुजर्ग बरगद अब
न मिलेंगे अपनी छाँव
नयी पीड़ी के पथिको को देने

शायद हर बुजर्ग बरगद
का नसीब फ़ैल कर कटना
होता होगा...
ये हमने भी आज जाना है....

Monday, March 21, 2011

तू तू मैं मैं

दो लफ्ज़ तेरे होंगे
दो मेरे
तीर बन दोनों के सीने छलनी होंगे

कुछ लहू तेरा बहेगा
बहुत कुछ मेरा
घायल दोनों होंगे

तुझे घायल देख सकूँ

ऐसी मुझ में ताकत नहीं


इसलिए तेरे तीर चुप चाप

सीने पर ले कर छलनी

कर दिया खुद को

न आने दी एक उफ़ होठो पर

या एक आंसू आँखों में


अनजान नहीं हम भी तेरी फितरत से

आज में ज़ख़्मी हूँ जो जिस्म से

कल तेरी रूह ज़ख़्मी होगी

और मेरे आँखों के समंदर

तेरी ही आँखों से बहेंगे


तब इन्ही तीरों से

सीने को और कुरेद कर

हम उन नमकीन मोतियों को

अपने सीने में पनाह देंगे...

Wednesday, March 9, 2011

कुछ क्षणिकाए

हाथो की लकीरों में लिखा एक नाम
आज हम मिटाना चाहते हैं
तुझे तेरी तकदीर को वापस लौटाना चाहते हैं
मिले तुझे मंजिल या नहीं..
हम तो बस तुझे साहिल पर लाना चाहते हैं...


2.
जाओ खंजर एक और ले आओ..
दिल के ज़ख्म अब मरहम से भरते नहीं


जाओ कोई पतझड़ ले आओ..
ज़िन्दगी अब बहारो से बहलती नहीं

3.
सुकून को चलो अब आराम थोडा दिया जाये
ज़िन्दगी से अब दो दो हाथ हो जाये...
4.
चुप रह कर भी कह जाती हैं
बातें कई हमारी ऑंखें
इसलिए हम
आजकल पलके मूंदे रहते हैं...

5.

बहुत तंग हैं दिल की वो गलियां
जिनसे होकर मेरी साँसे गुज़रती हैं
तुम अपने यादो की तस्वीर
कहीं और जाकर लगा दो

Saturday, December 11, 2010

..............

दिल के कसी छेद से

रुक रुक कर रिसती हैं

कुछ बीते पलों की यादें

कुछ वो ज़ख्म

जो वक़्त की मरहम

दे जाती है

कुछ ऐसे भ्रम

जो हमारी उमीदे

हम में भर जाती है.


भूल जाना चाहते है.

जिन्हें हम सदियों पहले

पर कम्भख्त भुलाये नहीं भूलते.

सच है अंधेरो में बुने ख्वाब

दिनों में नहीं पलते

बिखर जाते हैं

टूटे कांच की तरह

और बार बार लौटकर

आँखों में चुभ जाते हैं

छलना

सर्दियों की नर्म धूप अभी

पक के जमी नहीं

और तू है के

अभी से अलावे

लगा के बैठी है

दुनिया समझती है

तुझसे बदलते

मौसम का मिजाज़

सहन नहीं होता शायद

पर हम जानते हैं

तू इस अलावे की आग में

अपने जीवन के राग को

जलाकर खाक करना चाहती है

और अपने अश्को को

आग की दें समझकर

खुद को भी छलना चाहती है

कतरने ज़िन्दगी

कतरने ज़िन्दगी की

जमा करके बैठे हैं

कभी सिल लेते हैं

साँसों की तार से

कभी जोड़ लेते हैं

आंसूओ की धार से

पार कर लेते हैं

हर मंजिल कभी जीत के

कभी हार की मार से

न रुके थे

न रुकेंगे ये कदम

एक बार और चल पड़े

फिर से हम तलवार की धार पे

वोह लम्हे

उम्र की कैद में दफ़न

रखी एक मेज है

जिसकी दराजो

में छुपी

कुछ यादे है

ये दिल आज

फिर से उन दराजो

को खोलने की जिद्द कर बैठा

यादो की दरारों से

झांक कर

फिर से जीने की उम्मीद कर बैठा..


कंप-कांपते हुए हाथों से

दिल में दहकते शोलो से

मन के उन पुराने साजों से

थोड़ी हिम्मत मैंने जुटाई है ..

उन यादों से फिर आखें भर आई हैं ..

उस मेज की दराजो में

वोह लम्हे आज भी वैसे ही रखे हैं ...

कुछ मीठे कुछ नमकीन ,

कुछ ग़मगीन , कुछ रंगीन ...

वोह पल

मैंने आज फिर जी के देखे हैं .......

नाउम्मीदी

दिल के बयाबनो

तहखानो में

बेड़ियों से बाँध रखा था

जिन नाउम्मीदों को

न जाने किस छेद से

उम्मीद की किरण

उन तक पहुँच गयी

के मेरी नाउम्मीदी

फिर से गहरी नींद

से जग कर मेरे

सामने आ खडी हो गयी...


रुक जा वक़्त फिर से

मुड़ जा और ले चल

मुझे फिर उन्ही

बयाबानो में

जहाँ से ये लौटके आई हैं

और मेरा आत्मविश्वास

डगमगाई हैं

चल कर इन्हें

फिर वहीँ क़ैद कर आयें

और उस छेद में

भर माटी उसे भी बंद कर आये

सरिता...my friend

कुछ मीठी कुछ तीखी
हमारी सासु...सरिता जी

बहु की हर करनी
पर नज़रे जमाये रहती हैं
ससुरजी को बेहद प्यारी
हमारी सासु ...सरिता जी

स्वेता की सहेली
बातो में जिसकी एक पहेली
कुछ सुलझी कुछ उलझी
ऐसी हमारी सासु....सरिता जी

प्रेरणा की दी प्यारी
रूचि की बहना न्यारी
बहनों के लिए
बहु से करती तू तू में में
ऐसी हमारी...सासु...सरिता जी...


बोर्ड पे सबकी खेंचे
रहती हैं टांग सदा
ऐसी नटखट
हमारी सौस...सरिता जी


दिल पे न लगाना
एक चुटकी ली है
छोटी सी
सरिता...मेरी प्यारी सासु जी...

तकदीर

कुछ लिख के मिटा दिया

ज़िन्दगी ने मेरी तकदीर से

कुछ मिटा के लिख दिया

फिर से हाथ की लकीरों में


एक कतरा आंसू

था शायद

जो समन्दर बन

बहा आँखों से



मेरे सपनो का एक

सुन्दर जहाँ डूबा जिसमे

पर

मैं न डूबी न ही तर कर

पार हुई जिससे



बस भवन्डर में

टूटी नाव सी

गोते ही खाती रही....

Sunday, May 30, 2010

एक मासूम रिश्ता……

दो दिल
एक मासूम रिश्ता
सौ अरमान
हज़ार सपने
लाख महकते पल
कुछ संगीन कसमे
……………..जो जोड़ती
जन्मो के रिश्ते


दो दिल
एक दुनिया
सौ लोग
हज़ार बातें
लाख ताने
…..कुछ रीति -रिवाज
और पल भर में
टूटते जन्मो के रिश्ते …….

एक दिल …
एक पुराणी किताब …
सौ पीले पन्ने
एक सूखा गुलाब
मरके भी यहाँ जिंदा हैं
दो दिलों के रिश्ते …

एक दिल
एक डायरी
सौ नज्मे
हज़ार स्याही ओढे शब्द
कुछ सपनो की राख
मर कर भी सुलगते है
यहाँ दो दिलो के रिश्ते ….


एक दुनिया
दुनिया की भीड़
खाक हुए सपनो की राख में
अपनी रूह दफनाते
साँसों के कारवां के साथ
अपने लिए रेशमी कफ़न
बुनते बुनते
नए रिश्तो को
निभाते निभाते …
चलते दो दिल …………
और साथ दिलो में जीता उनके
वही
एक मासूम रिश्ता……

intezar-3

wo khdki wali seat par baithi
intezar kar rahi thi..train ke chalne ka
subah ke 6.45 baje the...
aur mausam pe halki gulabi thand thi
par uski ankhe..gam se nam thi
...dheere dheere gadi platform se sarkane lagi
aur uske pati ne uske ansoo ponch kar kaha
sab thik ho jayega...tum ja rahi ho na ab
aur bete ne kaha....maa take care..
gadi apni speed se badh rahi thi..
aur wo anmane man se chetan bhagat ko padh rahi thi
bete ne uski nayi book la di..
aur kaha tha train me issa achha timepass hoga
par uske dimag ke byscope me
kuch aur hi chitra ghum rahe the...
kabhi kabhi auro ke intezar me
wo zindagi ki philosophy dhundh kar
apna dhyan us byscope se hata rahi thi..
par aaj dil ro raha tha
aur dimag...to jaise
5 ghante ke safar me 45 salo ki
film dikhane pe ada tha
bar bar uski ankhen nam hoti
wo do ghunt pani ke pee
fir ksi aur ke intezar ko nayi
philosophy de dekar
apni diary me note kar deti


us nanhe se safar me intezar sabko tha
aur use bhi...

kya wo zindagi dene wali maa ko
operation theater me jane se pehle
ek nazar dekh payegi..
kya wo usse bat kar payegi
kahin ye train late ho gayi to????
ye dar bar bar uski jan khaye ja raha tha..

apne gantvya station pe utar
taxi rok
usne kaha...

............... hospital...
uska ek intezar khatam...
aur duja shuru ho raha tha.............