Wednesday, March 25, 2009

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तोड़ आइने अपने अक्स से जुदा हो गए
घेर कर अँधेरे
परछाई से दूर हो गए
बेखुद इतना हुए की
खुद को भूल गए ...............

Thursday, March 12, 2009

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धरा हूँ अपनी धुरी से हिल नहीं सकती
चाह कर भी अपने सूरज से मिल नहीं सकती
माना चाँद मेरा हिस्सा था कभी
फिर से उसे आँचल में छुपा नहीं सकती
अभी मेरे आँगन को और तपिश सहनी है
चांदनी को अभी और इस आँगन में खेलना है
कई बादल और बरसने है
इस मिटटी को और गिला होना है...
शायद
जीवन पोषण ही बस है ध्येय मेरा
इसलिए सदियों यूँही मैं चली हूँ
और सदियों और मुझे चलना है
सदियों और मुझे चलना है......

Saturday, February 14, 2009

मेरा जवाब

जब मौत की दस्तक मेरे दरवाज़े होगी
जींदगी के लिए क़यामत
मेरे लीए खुदा की नेमत होगी
...क्यूँ की उस दीन मेरी उस खुदा से मुलाक़ात होगी ...
सुना है ...
तब खुदा हर बंदे से एक सवाल पूछता है .........
" मेरी दी जींदगी कैसे बीतायी "
सोच रहे हम तब उसे कयाँ जवाब देंगे
जींदगी का कोई लेखा तो रखा नही
खुदा को क्या हिसाब देंगे
...बस येही कहेंगे ....
" जीमेदारी की सेज पे
सलवटों में लिपटी मिली थी
जींदगी .....................
इस की सतहें सीधी
करने में हमने सारी उम्र खर्च कर दी ..."

Thursday, December 4, 2008

एक माँ की पुकार

मौत बेच कर
ज़िन्दगी खरीदने वाले
ऐ बेगैरत सौदागर सुन
मरने वाला
न हिन्दू था
न मुस्लमान
न सिख
न इसाई
वो तो बेचारा एक बेगुनाह इन्सान था
…जिसे किसी की कोख ने नौ महीने पाला था
अपने खून से जिसका बचप्पन सींचा था
तेरी बेरहम गोली कि वार से
उस माँ का बुढापा आज अनाथ हुआ है …
मंदिर देख
मस्जिद देख
देख ले गुरद्वारे
और चर्च जाकर
हर माँ कि सीने से बस एक दुआ आज उठी है
मेरे बच्चे को उम्र दराज़ करना
पुकार येही हर द्वार लगी है
गौर से देख
तेरी लिए भी कहीं दो हाथदुआ के लिए उठे हैं
तेरे लिए भी मांग रहे यही
।इश्वर करे
या करे खुदा
तेरी माँ का बुढापा सनाथ रहे
तू जिंदा रहे
॥बस तेरे अन्दर की नफरत मरे
…बस तेरे अन्दर की नफरत मरे
…।यदि मजबूर है खुदा भी तेरी बन्दूक के सामने
तो ये माँ यही मांगेगी
॥बच्चे से पहले तेरी गोली उसे छलनी करे

Friday, November 28, 2008

वो अनाथ आँखें

रात के अंधेरों
में उज्जालो के ख्वाब बुनती हैं
अमावास कि स्याही में
दीवाली ढूंढती हैं

..........ना चीनी है
ना आटा है
ना ही घी है कहीं
खाली पड़े मर्तबानो मेंहलवे पूरी का स्वाद ढूंढती हैं

........ना बाप है
ना भाई है
ना ही कोई दोस्त
दिलों को मीठी बातों से छूकर
परायों में अपनों का अहसास ढूंढती हें

ग़मों सी पतझड़ ज़िन्दगी से
यह नादाँ
रौशनी से अनाथ आंखें
हर पल खुशियों की बगिया ढूढती हैं...


Tuesday, September 9, 2008

राहे रेगिस्तान पे

कारवां का अकेला राही
बढ़ता चला राहे रेगिस्तान पे

नक्शे कदम मेरे लिए कोई नही
राहे रेगिस्तान पे..........
अपनी राह ख़ुद बनता चला राहे रेगिस्तान पे

थक चला सूरज भी..ढल कर अपने
बिस्तर में सो गया....
मअं न थका...ख़ुद को जलाकर रौशनी की
राआहे रेगिस्तान पे

चाँद भी करके अमावस का बहाना
छुप गया ..तारे भी थक कर पडाव में बैठे रहे
मैं न रुका ......चलता चला
राहे रेगिस्तान में

ये आंधी , ये रेत के तूफ़ान
तोड़ पहाड़ चले जहाँ
मैं न टूटा वहां
राहे रेगिस्तान

की राही ठोस मंजिल का हु
रेत का ज़र्रा नही उड़ा लिया जाऊं
ये विश्वास ख़ुद को हर पल दिलाता चला
राहे रेगिस्तान पे.............

Tuesday, August 26, 2008

अपनी स्मित बनाये रखना

दिल की ज़मीन पर
जब जब भी अहसासों के ज़लज़ले आते हैं
आंसुओं के समुन्द्र में एक सुनामी सी लाते हैं
तब
हर लहर उछालने लगती है
आँखों के किनारे तोड़ बहने लगती है
और
राह में आती हर मुस्कान तबाह कर देती है ……

इन अहसासों के ज़लज़ले से बचना
किसी के लिए अपनी मुस्कान तबाह न करना
माना
… उसकी की याद में …
ज़िन्दगी दोज़ख बन जायेगी …
।तुम बस अपनी लाश के हाथ में
उम्मीद के झंडे संभाले रखना …
॥जबरन ही सही …
होठों की स्मित बचाए रखना ......