सावन आये तो तू भी आ जाना
मन के आँगन की फुलवाड़ी से
दो फूल तोड़ लाना
सजा देना उसे मेरे बालो में
और दो मीठी बाते बोल लेना
धीरे से फिर दिल की दराज़ खोलना
उनमे कुछ ख्वाब बुने रखते थे हम कभी
उन मखमली ख्वाबो को तू
ज़रा अपनी आँखों से भी छू लेना.....
फिर हलके से रूह में उतर कर
तू मुझे इस दुनिया से दूर कहीं
उस जगह ले चलना
जहाँ से लौट के कोई सदा नहीं आती कभी
हर फागन में यही गुहार तुझसे लगते हैं
प्रेम का पुराना आलाप सुनाते हैं
ये आखिरी बार गुहार करते हैं
हर बार की तरह
नैनों को मेघो समझ न बरसाना .
सावन आये तो तू भी आ ही जाना...
Monday, March 26, 2012
Tuesday, December 27, 2011
meri chhoti kavitaye
1.
कुछ ख्वाब देख कर
हैरान थी ऑंखें उनकी
शायद सपने में
कोई आके उन्हें
आइना दिखा गया..
हैरान थी ऑंखें उनकी
शायद सपने में
कोई आके उन्हें
आइना दिखा गया..
2.
कुछ गीले सपने
टूटे से बिखरे थे
उसके आंगन में
शायद सूखी आँखों में
कुछ आंसू और बचे थे. ...............
टूटे से बिखरे थे
उसके आंगन में
शायद सूखी आँखों में
कुछ आंसू और बचे थे. ...............
3.
ऐ दिल कहा था
न रोना इतना
ये जमीन गीली न करना
देख..
कितने सपने फिसल के गिरे है यहाँ.
न रोना इतना
ये जमीन गीली न करना
देख..
कितने सपने फिसल के गिरे है यहाँ.
4.
वो देखो दूर खडी मौत
मुझे देख कहकहे लगा रही
और अपनी ठिठोली भरे
अंदाज़ में पूछ रही
इन्सान बनके जन्मे हो....
इन्सान बन कर मर भी पाओगे......?????????????
मुझे देख कहकहे लगा रही
और अपनी ठिठोली भरे
अंदाज़ में पूछ रही
इन्सान बनके जन्मे हो....
इन्सान बन कर मर भी पाओगे......?????????????
5.
चुप रह कर भी कह जाती हैं
बातें कई हमारी ऑंखें
इसलिए हम
आजकल पलके मूंदे रहते हैं..
बातें कई हमारी ऑंखें
इसलिए हम
आजकल पलके मूंदे रहते हैं..
6.
बहुत तंग हैं दिल की वो गलियां
जिनसे होकर मेरी साँसे गुज़रती हैं
तुम अपने यादो की तस्वीर
कहीं और जाकर लगा दो
जिनसे होकर मेरी साँसे गुज़रती हैं
तुम अपने यादो की तस्वीर
कहीं और जाकर लगा दो
Friday, October 7, 2011
पहचान
दिल के अरमानो को सीने से बाहर निकालो
शहर कि गलिया तंग हैं...
इन्हें खुली हवा थोड़ी खिला दो
लाख जफ्फा करे दुनिया तो क्या
रंझो ग़म को तुम अपना गुलाम बना दो
मुस्कराने कि सजा हर पल मिलेगी
मगर फिर भी तुम उसे अपना ईमान बना दो
बदल दो मायने खुदाई के अपने वास्ते
बस खुद से एक बार अपनी पहचान बना दो
शहर कि गलिया तंग हैं...
इन्हें खुली हवा थोड़ी खिला दो
लाख जफ्फा करे दुनिया तो क्या
रंझो ग़म को तुम अपना गुलाम बना दो
मुस्कराने कि सजा हर पल मिलेगी
मगर फिर भी तुम उसे अपना ईमान बना दो
बदल दो मायने खुदाई के अपने वास्ते
बस खुद से एक बार अपनी पहचान बना दो
Thursday, March 24, 2011
बूढ़े बरगद
सदियों की उम्र लिए
बरगद के कुछ पेड़
वहीँ खड़े हैं
जहाँ
दुरी मिटाने मेरे शहर में
एक पुल बन रहा
धीरे धीरे एक आड़ी
चल रही उनके सीनों पर
और एक एक कर
वो तरक्की की बलि चढ़ रहे
शायद....
खुद को काट कर
नयी पीढी के लिए
रास्ता बनाना
हर पुराने
बरगद के नसीब है...
पुल तो बना था दुरी मिटाने
पर ये बुजर्ग बरगद अब
न मिलेंगे अपनी छाँव
नयी पीड़ी के पथिको को देने
शायद हर बुजर्ग बरगद
का नसीब फ़ैल कर कटना
होता होगा...
ये हमने भी आज जाना है....
बरगद के कुछ पेड़
वहीँ खड़े हैं
जहाँ
दुरी मिटाने मेरे शहर में
एक पुल बन रहा
धीरे धीरे एक आड़ी
चल रही उनके सीनों पर
और एक एक कर
वो तरक्की की बलि चढ़ रहे
शायद....
खुद को काट कर
नयी पीढी के लिए
रास्ता बनाना
हर पुराने
बरगद के नसीब है...
पुल तो बना था दुरी मिटाने
पर ये बुजर्ग बरगद अब
न मिलेंगे अपनी छाँव
नयी पीड़ी के पथिको को देने
शायद हर बुजर्ग बरगद
का नसीब फ़ैल कर कटना
होता होगा...
ये हमने भी आज जाना है....
Monday, March 21, 2011
तू तू मैं मैं
दो लफ्ज़ तेरे होंगे
दो मेरे
तीर बन दोनों के सीने छलनी होंगे
कुछ लहू तेरा बहेगा
बहुत कुछ मेरा
घायल दोनों होंगे
तुझे घायल देख सकूँ
ऐसी मुझ में ताकत नहीं
इसलिए तेरे तीर चुप चाप
सीने पर ले कर छलनी
कर दिया खुद को
न आने दी एक उफ़ होठो पर
या एक आंसू आँखों में
अनजान नहीं हम भी तेरी फितरत से
आज में ज़ख़्मी हूँ जो जिस्म से
कल तेरी रूह ज़ख़्मी होगी
और मेरे आँखों के समंदर
तेरी ही आँखों से बहेंगे
तब इन्ही तीरों से
सीने को और कुरेद कर
हम उन नमकीन मोतियों को
अपने सीने में पनाह देंगे...
दो मेरे
तीर बन दोनों के सीने छलनी होंगे
कुछ लहू तेरा बहेगा
बहुत कुछ मेरा
घायल दोनों होंगे
तुझे घायल देख सकूँ
ऐसी मुझ में ताकत नहीं
इसलिए तेरे तीर चुप चाप
सीने पर ले कर छलनी
कर दिया खुद को
न आने दी एक उफ़ होठो पर
या एक आंसू आँखों में
अनजान नहीं हम भी तेरी फितरत से
आज में ज़ख़्मी हूँ जो जिस्म से
कल तेरी रूह ज़ख़्मी होगी
और मेरे आँखों के समंदर
तेरी ही आँखों से बहेंगे
तब इन्ही तीरों से
सीने को और कुरेद कर
हम उन नमकीन मोतियों को
अपने सीने में पनाह देंगे...
Wednesday, March 9, 2011
कुछ क्षणिकाए
हाथो की लकीरों में लिखा एक नाम
आज हम मिटाना चाहते हैं
तुझे तेरी तकदीर को वापस लौटाना चाहते हैं
मिले तुझे मंजिल या नहीं..
हम तो बस तुझे साहिल पर लाना चाहते हैं...
2.
जाओ खंजर एक और ले आओ..
दिल के ज़ख्म अब मरहम से भरते नहीं
जाओ कोई पतझड़ ले आओ..
ज़िन्दगी अब बहारो से बहलती नहीं
3.
सुकून को चलो अब आराम थोडा दिया जाये
ज़िन्दगी से अब दो दो हाथ हो जाये...
4.
चुप रह कर भी कह जाती हैं
बातें कई हमारी ऑंखें
इसलिए हम
आजकल पलके मूंदे रहते हैं...
5.
बहुत तंग हैं दिल की वो गलियां
जिनसे होकर मेरी साँसे गुज़रती हैं
तुम अपने यादो की तस्वीर
कहीं और जाकर लगा दो
आज हम मिटाना चाहते हैं
तुझे तेरी तकदीर को वापस लौटाना चाहते हैं
मिले तुझे मंजिल या नहीं..
हम तो बस तुझे साहिल पर लाना चाहते हैं...
2.
जाओ खंजर एक और ले आओ..
दिल के ज़ख्म अब मरहम से भरते नहीं
जाओ कोई पतझड़ ले आओ..
ज़िन्दगी अब बहारो से बहलती नहीं
3.
सुकून को चलो अब आराम थोडा दिया जाये
ज़िन्दगी से अब दो दो हाथ हो जाये...
4.
चुप रह कर भी कह जाती हैं
बातें कई हमारी ऑंखें
इसलिए हम
आजकल पलके मूंदे रहते हैं...
5.
बहुत तंग हैं दिल की वो गलियां
जिनसे होकर मेरी साँसे गुज़रती हैं
तुम अपने यादो की तस्वीर
कहीं और जाकर लगा दो
Saturday, December 11, 2010
..............
दिल के कसी छेद से
रुक रुक कर रिसती हैं
कुछ बीते पलों की यादें
कुछ वो ज़ख्म
जो वक़्त की मरहम
दे जाती है
कुछ ऐसे भ्रम
जो हमारी उमीदे
हम में भर जाती है.
भूल जाना चाहते है.
जिन्हें हम सदियों पहले
पर कम्भख्त भुलाये नहीं भूलते.
सच है अंधेरो में बुने ख्वाब
दिनों में नहीं पलते
बिखर जाते हैं
टूटे कांच की तरह
और बार बार लौटकर
आँखों में चुभ जाते हैं
रुक रुक कर रिसती हैं
कुछ बीते पलों की यादें
कुछ वो ज़ख्म
जो वक़्त की मरहम
दे जाती है
कुछ ऐसे भ्रम
जो हमारी उमीदे
हम में भर जाती है.
भूल जाना चाहते है.
जिन्हें हम सदियों पहले
पर कम्भख्त भुलाये नहीं भूलते.
सच है अंधेरो में बुने ख्वाब
दिनों में नहीं पलते
बिखर जाते हैं
टूटे कांच की तरह
और बार बार लौटकर
आँखों में चुभ जाते हैं
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