Thursday, July 10, 2008

चलो अब हम भी बतियाते हैं

बड़ी चतुर हमारी सरकार
करती हमेशा नए कमाल
कैसे ??????????
हम आपको बताते हैं ..
एक हफ्ते के राशन में
ही जेब होती अब पूरी तरह कंगाल ….
महीने के मध्य मैं
रसोई में डब्बे खलीबर्नियाँ पड़ी तंग-हाल
शुक्र है .
.मोबाइल का बैलेंस बाकी है
sarkari वादों से तो ऊब चुके
अब हम भी बातों से पेट भरते हैं
इसी बहाने ……………
अपने दांतों और आंतो को कुछ आराम भी दे देते हैं
..और अबसे जुबान से कम लेते हैं
नानी -दादी , चाची- मामी , बुआ -मौसी
सभी से जी भर ..ना ना पेट भर बतियाते हैं ….
चिदंबरमजी …
मुंह को खाना और बोलना
बस दो काम ही आते हैं
ये आप ही नहीं हम भी खूब जानते हैं ….
Kutumbhwalo
कितनी चतुर हमारी सरकार
रोटी -दाल से सस्ती कर दी STD.... काल

Tuesday, July 8, 2008

टूटी ग़ज़ल.....

बड़े नाजों से पाला था
शीशे सा संभाला था
जिसे वो ग़ज़ल ……………….
.कल मेरे हाथों से छुट गयी
और हजारों टुकडों में टूट गयी
अब हर तरफ मेरे बस लफ्ज़ ही लफ्ज़ बिखरे हैं …..
जो कभी मुझे सुकून देते थे
आज वो टूटे कांच से चुभते हैं …..
ऐ ग़ज़लों वाली लड़की सुन
थोडी आंच देकर
इन कांच के लफ्जों को पिघला दो
और
तुम ग़ज़लों वाले लड़के (खुदा )
इन पिघले लफ्जों को
नए सांचे में डाल
मेरी टूटी ग़ज़ल को नया रूप दे दो ….

Wednesday, June 25, 2008

गरूर एक यह भी

रात भर चाँद पिघलता रहा
हम बूँद बूँद चान्दिनी
अपने चांदी की परात में
इकठा करते रहे
अपनी सर्द आहों की देकर हवा
उसे परत भर परत जमाते रहे
जब चाँद पूरी तरह जम गया
तब फिर से उसे
….अपने प्यार के धागों
से खेंच कर फलक पर लटकाया
और घूरते रहे …अपनी कोशिश पे गरूर खाते रहे

Wednesday, June 4, 2008

यादों के हीरे

कभी था जो महल
मेरा वो आलीशान दिल
अब खंडहर बन चुका
प्यार के पन्ने
मोहब्बत के मोती
जिसे जो मिला लूट चुका ….
बस तेरी याद के कुछ हीरे
बचे है
जो एक तहखाने में
बड़ी हिफाज्जत से
सम्भाल्के हमने रखे हैं ….
वादा है ये तुमसे
इन्हें लुटने न देंगे…...
दीवारें डेह भी जाये तो क्या
इस दिल के दरवाज़े
अब किसी के लिए न खुलेंगे …………

Monday, May 26, 2008

निमंत्रण

माननीय श्री मनमोहनजी
माननीय श्री चिद्म्बर्मजी
लेफ्ट के कमजोर सहारे पे टिक्की
यूँ ही आपकी सरकार बेहाल है
उस पे असमान छूती महंगाई
ने किया इसका और बुरा हाल है
इससे से पहले की अगले चुनाव में
आपकी ये बीमार सरकार परलोक सिधारे
मेरे घर एक बार आप अवश्य पधारे …
वैसे तो मै एक साधारण सी
मध्यम वर्गीय गृहणी हूँ
जो सादी दाल-रोटी सपरिवार खाती हूँ
वही आपको भी खिलाऊंगी
आकार मेरा आतिथ्य स्वीकारें
अब आगे मेरे निमंत्रण का
असल मकसद भी बांचे
“इस कमरतोड़ महंगाई
मेंजहाँ दाल -रोटी भी
बड़ी मुश्किल से जुटा पाते है,
बच्चे हैं की
अपने नए सपने नए अरमानों की
रोज एक फेहरिस्त लगाते है.”
“मेरा छोटा बेटा बिन कोटे का होकर
भी पोस्ट -ग्राजुअशन करना चाहता है,
उसकी महंगी फीस के
लिए अपनी दाल को काटू????
या रोटी को ग्रहण लगाऊ ????”“
उस पर बड़ा बेटा ..
अपनी एकलौती प्रेयसी को
छोटे मोटे तोहफे देकर खुश रखना चाहता है
इस विशेष खर्च का गणित
अपनी लड़खाद्ती बजट में कहाँ बिठाऊँ ?”
हे देश के करता -धरता
हे अंको , वित और गणित के
महानुभावो शायद मेरे ही सवालों में
आपको फिर से सरकार बनाने के पक्के कोई हल मिल जाये ....
.इसलिए कृपया यह निमंत्रण
ख़त नहीं तार समझकर स्वीकारें ….
और लालूजी की अगली गाड़ी पकड़ कर
मेरे घर अवश्य पधारे ...

Saturday, May 10, 2008

आज तुझे मैं बेच आया माँ....

हर रोज़ अपने दिल के चूल्हे
सुबह सुबह उठ कर
को खूब लीपता हूँ
फिर उसमे अपने
अरमानोंके कोयले जलाता हूँ
और घर के बच्चे खुछे
मिटटी के बर्तनों कोउन पर रख कर
रात भर जो भीने हैं
उन सपनो के दानो की
खिचडी उनमे पकाता हूँ
उस में सरकारी वादों का नमक
और
नेताई इरादों की मिर्च डालकर
ख्चिडी में कुछस्वाद ले की कोशिश करता हूँ
और इसे संतावना के
घी के साथ परोस कर सपरिवार खाता हूँ
कहने को तो मैं भी एक अन्नदाता हूँ
पर आजकल येही खाता हूँ
सोचता हूँ कभी की ख्याली पुलाव भी पका लू
और बच्चों को उनका भी स्वाद चखाऊ
पर बड़ी सूखि हैं अब हमारी आंते
इसे हजम न कर पाई तो ??????????
इसलिए खिचडी से ही कम चलाता हूँ
हाथी को मन और चींटी को कणदेने वाले
विधाता की कतार में भी
मैं सदा अन्तिम क्रम पे ही आता हूँ
.इसलिए हर रात sahkutumbh भूखा ही सोता हूँ
भूमिपुत्र होना मेरे लिए गर्व की बात है
पर गर्व से बच्चों का पेट नहीं भरता माँ
इसलिए आज में तेरा सौदा कर आया हूँ
तुझे एक माल बनाने वाले के पास बेच आया हूँ
मजबूर हूँ...माफ़ करना माँ
मैं भी अपने भूखे नंगे बच्चों को
दो वक़्त की रोटी देना चाहता हूँ...

Thursday, May 8, 2008

खुदा- हाफिज़

यूँ तो आगे बढ़ कर लौटना
मेरी आदत नहीं
शायद तेरी भी नहीं
पर किसी जन्नत -नशीं की
खवाइश थी
और यह खुदा की भी मर्जी थी
फिर तेरे मेरे पवित्र -पुनीत -पाक
रिश्ते पर ग़लतफहमी का जो
भद्दा सा दाग था
उसका धुलना भी ज़रूरी था

इस दाग पे हमने
अपने दिल की दुआओं का
खूब साबुन घिस्सा है
फिर अपने गरम आँसूओ में
इसे खूब खंगोला है
और आखिर में इसे अपने
प्यार के कलफ में घोला है

मेरे यहाँ तो
सूरज ढलान पे है
पर तेरे आंगन की
धूप अब भी बड़ी तेज़ है
इसलिए
इसे वहीं सुखाने छोडा है
बस
एक गुजारिश है
जब ये रिश्ता पूरी तरह सूख जाये
तो इसे उठा लेना
और अच्छी सी तहें लगा कर
अपने दिल की अलमारी के
किसी अंधे कोने में
इसे रख देना
और हो सके तो
इसे चमचमाते
नए रिश्तों से ढँक देना ………..

खुदा-हाफिज़.